इन्दौर

Narmada Kshipra Link: स्नान के पवित्र पानी पर 'चोरी' की मार

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महाकाल की नगरी उज्जैन में पांच साल पहले देश-दुनिया ने एक सोच को सच होते देखा था, नर्मदा-शिप्रा लिंक परियोजना के माध्यम से नर्मदा के जल से शिप्रा को सदानीरा (हमेशा पानी से भरा रहने वाला) बनाए रखने का। हजारों लोगों की धार्मिक आस्था की केंद्र शिप्रा में पानी का प्रवाह लगातार बनाए रखने के इस प्रयास को अवैध तरीके से पानी लेने वालों की नजर लग गई है। कई बार नर्मदा का पानी शिप्रा में आया जरूर लेकिन वह नदी में बहने की बजाए गैरकानूनी तरीके से सिंचाई और अन्य कामों में उपयोग कर लिया गया। हालांकि इन्हें भी पूरी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता लेकिन इसी साल के शुरू में शनिश्चरी अमावस्या को ऐसे हालात बन गए कि श्रद्धालुओं को कीचड़ मिले जल के छींटे डालकर संतोष करना पड़ा। कहीं- कहीं स्नान हुआ भी तो पाइप से निकल रहे पानी से।

नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) ने अब तक 22 रुपए 60 पैसे प्रति हजार लीटर खर्च के हिसाब से 200 करोड़ रुपए का पानी शिप्रा में छोड़ा है लेकिन उक्त कारणों से यह नदी में नहीं रुका। अब इसे सहेजने की आवश्यकता है। शिप्रा को सदानीरा व प्रवाहमान बनाने सहित सिंचाई और उद्योगों को पानी देने के लिए प्रदेश सरकार ने 432 करोड़ रुपए खर्च कर नर्मदा नदी को शिप्रा से जोड़ा था। 16 फरवरी 2014 को हुए नर्मदा-शिप्रा लिंक परियोजना के लोकार्पण में तत्कालीन भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि इस संगम से मालवांचल की धरती समृद्ध होगी। किसान, उद्योगों समेत सभी को पर्याप्त पानी मिलेगा।

अब तक 90 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी आया : पिछले पांच सालों में नर्मदा का 90 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी शिप्रा नदी में छोड़ा गया। हालांकि पानी छोड़ा भी गया तो केवल पर्व-स्नान के लिए। वह भी कुछ ही दिनों में सिंचाई के लिए चोरी हो गया। परिणाम यह हुआ कि शिप्रा को सदानीरा, शुद्ध और प्रवाहमान बनाने की मंशा पूरी नहीं हो पाई। चूंकि शिप्रा सदानीरा नहीं बन सकी इसलिए इंतजार: नर्मदा के पानी से शिप्रा को लबालब करने के प्रयासों को पलीता, पवित्र जल में डुबकी लगाने तरसे लोग स्नान के पवित्र पानी पर 'चोरी" की मार सिंचाई व उद्योग के लिए भी नियमित पानी नहीं दिया जा सका। एनवीडीए की रिपोर्ट के अनुसार छोड़ा गया पानी सहेजा जाता तो छह एमसीएफटी रोज खपत के मान से 532 दिन शहर में जल प्रदाय संभव होता।

कमिश्नर-कलेक्टर नपे थे

प्रदेश में कमलनाथ सरकार बनने के बाद उज्जैन में पहला प्रमुख पर्व स्नान जनवरी में शनिश्चरी अमावस्या पर हुआ था। उज्जैन तक नर्मदा का पानी न पहुंचने से लोगों को कीचड़युक्त जल में स्नान करना पड़ा था। इससे सरकार विपक्ष के आरोपों से घिर गई थी। ताबड़तोड़ मुख्यमंत्री कमलनाथ ने जांच से पहले ही तत्कालीन कमिश्नर एमबी ओझा और कलेक्टर मनीष सिंह को हटा दिया था। इस कड़ी कार्रवाई का परिणाम यह हुआ कि मकर संक्रांति पर शिप्रा नदी में पानी हो, इसके लिए भोपाल तक के अफसरों को मैदान में उतरना पड़ा। एक तरह से सिंहस्थ जैसी तैयारियां की गईं।

शिप्रा न्यास का इंतजार

विधानसभा चुनाव के दौरान शिप्रा चुनावी मुद्दा भी बनी थी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक सभा में शिप्रा का मटमैला पानी एक बोतल में भरकर लोगों को दिखाया था और कहा था कि ये 450 करोड़ का पानी है। इसके बाद कांग्रेस ने अपने वचन पत्र में शिप्रा न्यास बनाने की बात कही थी हालांकि न्यास को लेकर अभी तक कोई ठोस कवायद नहीं हुई है।

एक और योजना पर काम

सरकार अब पाइपलाइन के जरिए नर्मदा का जल उज्जैन लाने की तैयारी कर रही है। शिप्रा के उद्गम स्थल उज्जैनी (इंदौर जिला) से उज्जैन तक 1325 मिमी व्यास की 66.17 किमी लंबी पाइपलाइन बिछाई जा रही है। यह काम 139 करोड़ रुपए लागत का है, जो मार्च में पूरा होने की बात कही जा रही है। मालूम हो कि पूर्व की योजना अनुरूप नर्मदा का जल सिसलिया तालाब से पंपिंग कर पाइपलाइन के जरिए उज्जैनी में लाकर शिप्रा नदी में छोड़ा जा रहा है। वहां से पानी प्राकृतिक प्रवाह के जरिए देवास होकर उज्जैन आ रहा है। प्रवाह क्षेत्र का काफी हिस्सा बहाव योग्य नहीं रहने और पानी की बड़ी मात्रा रास्ते में ही चोरी होने से उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो पा रही है इसलिए सरकार ने पाइपलाइन के जरिए नर्मदा का जल उज्जैन पहुंचाने की योजना बनाई है।

गंभीर के रास्ते लाई जा रही है नर्मदा

गंभीर नदी के रास्ते भी नर्मदा का जल उज्जैन लाया जा रहा है। पाइपलाइन बिछाने का 85 फीसदी काम हो चुका है। दरअसल उज्जैन, इंदौर और खरगोन के 150 गांवों में पाइपलाइन के जरिये नर्मदा का पानी पहुंचाने के लिए नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) ने फरवरी, 2015 में 1842 करोड़ रुपए का नर्मदा-मालवा गंभीर लिंक प्रोजेक्ट शुरू किया था। एनवीडीए ने हैदराबाद की नवयुग कंस्ट्रक्शन कंपनी से अनुबंध किया था कि कंपनी तीन वर्ष में काम पूरा करके देगी। यानी फरवरी, 2018 तक लेकिन ऐसा नहीं हुआ। प्रभावित किसानों का मुआवजा अटकना और पाइपलाइन बिछाने को रेलवे से अनुमति नहीं मिलना प्रमुख कारण रहा। दोनों ही सूरत में काम अब भी अधूरा है। हालांकि अफसर जल्दी ही इसके पूरा होने की बात कह रहे हैं।

किसानों की मांग- खेतों को भी दें पानी

नदी से पानी कथित रूप से चोरी होने के मामले में किसानों का कहना है कि यह उनकी विवशता है। योजना से पूर्व खेतों में लगे बोरिंग आदि से वे सिंचाई करते थे। मगर ये नाकाफी साबित होते थे। नर्मदा-शिप्रा लिंक परियोजना शुरू होने के बाद किसान नदी के बहाव से पानी लेने लगे। किसान नेता शेर अली पटेल का कहना है कि शासन को योजना बनाकर नर्मदा का पानी स्नान के लिए लाने के साथ- साथ खेतों तक पहुंचाना चाहिए। इसके लिए किसान हरसंभव मदद करने को भी तैयार हैं।