जबलपुर

मप्र / उमरिया में अतिथि विद्वान ने फांसी लगाकर आत्महत्या की; पत्नी ने कहा- 6 महीने से आर्थिक तंगी झेल रहे

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भोपाल/उमरिया. उमरिया जिले में पदस्थ अतिथि विद्वान संजय कुमार ने आर्थिक तंगी के चलते किराए के घर में फांसी लगाकर सोमवार की रात आत्महत्या कर ली। घटना चंदिया तहसील की है। संजय कुमार चंदिया कॉलेज में ही स्पोर्ट्स टीचर के रूप में पदस्थ थे। बताया कि मृतक संजय कुमार की पत्नी लालसा देवी के पास पति के शव को अपने गृह जिला बलिया तक ले जाने के लिए किराए के पैसे नहीं थे। अतिथि विद्वानों एवं स्थानीय प्रशासन के सहयोग से संजय कुमार का शव उनके गृह जिले बलिया भेजा गया है। 

पत्नी लालसा देवी ने बताया कि पति ने भोपाल में आंदोलन किया, फिर लौट आए थे। उन्हें छह महीने से सैलरी नहीं मिली है। वो कहते थे अब मेरे बच्चों के भविष्य का क्या होगा। सरकार ने हमारे पेट में लात मार दी। हमें कहीं का नहीं छोड़ा। धरने पर जा रहे हैं तो सरकार कोई व्यवस्था नहीं कर रही थी। छह छह महीने से सैलरी नहीं मिली थी। बहुत परेशान थे। इधर-उधर से मांगकर हम अपना खर्चा चला रहे थे। रूम का किराया नहीं दे पाए, बच्चा 10वीं में पढ़ता है, उसकी फीस नहीं भर पाए हैं। 

मंत्री के पास पति की मिट्टी लेकर जाऊंगी
पत्नी लालसा ने कहा "अब मेरे सामने कोई रास्ता नहीं है। मंत्री (उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी) आएं या फिर मैं मंत्रीजी के पास पति की मिट्टी लेकर जाऊंगी। मेरी तो जिंदगी ही खत्म हो गई है। मैं क्या करुं, कहां जाऊं। अगर मंत्री जी मेरे लिए कुछ नहीं कर सकते तो मैं भी आत्महत्या कर लूंगी, मंत्री जी तभी खुश होंगे। मैं चाहती हूं कि मंत्री जी मुझे और मेरे बच्चे के भविष्य को देखें। अब मंत्री जी को निर्णय लेना है, वरना मैं भी तीनों बच्चों के साथ पति की तरह आत्महत्या कर लूंगी।" 

संजय जैसी परिस्थितयों से हजारों अतिथि विद्वान गुजर रहे 
नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने ट्वीट करके कहा है कि संजय जैसी परिस्थितियों से आज हजारों अतिथि विद्वान गुजर रहे है। क्या 1 साल में आपकी यही उपलब्धि है। अतिथि विद्वान अवसाद और चिंता में आत्महत्या कर रहे है। मुख्यमंत्री जी आप कितनी और मौत होने का इंतज़ार कर रहे है। क्या सरकार के लिए इनकी जान की कोई कीमत नही है?

आर्थिक तंगी का शिकार हो गया हमारा एक साथी 
अतिथि विद्वान नियमितीकरण संघर्ष मोर्चा के संयोजक देवराज सिंह ने कहा है की नियमितीकरण की बाट जोहते और लगातार आर्थिक तंगी झेल रहे हमारा एक साथी आज अपने जीवन कि लड़ाई हार गया है। मैं सरकार से पूछना चाहता हूँ कि आखिर और कितने अतिथि विद्वानों की बलि उच्च शिक्षा विभाग लेगा।